धारा 299 का मूल भाषा में प्रावधान (Bare Act Text):-
(विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हों)
जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या इलेक्ट्रानिक साधनों द्वारा या अन्यथा करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
📜 BNS धारा 299 — धार्मिक भावनाओं को आक्रमित करने वाले जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य (Deliberate & Malicious Acts Outraging Religious Feelings) :-
भारत में कानून के नए ढांचे Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 में कई धाराएँ हैं जो धार्मिक भावनाओं और सामाजिक शांति की रक्षा करती हैं। उनमें से धारा 299 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जिसका लक्ष्य धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों को अपराध के दायरे में लाना है।
🎯 धारा 299 का उद्देश्य :-
BNS धारा 299 का मुख्य उद्देश्य है:
◆ धार्मिक सद्भाव बनाए रखना
◆ समाज में सांप्रदायिक तनाव से बचना
◆ किसी भी समुदाय की धार्मिक विश्वासों की अवमानना को रोकना
◆ नागरिकों को जवाबदेह बनाना कि वे अपनी अभिव्यक्ति का प्रयोग जिम्मेदारी से करें
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और धर्म-आधारित विविधता वाले देश में यह कानून सामाजिक शांति, सम्मान और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक माना गया है।
🧠 BNS धारा 299 के मुख्य तत्व :-
● जानबूझकर (Deliberate) इरादा:
केवल अनजाने में कही गई बात नहीं — इरादा स्पष्ट रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करना होना चाहिए।
● दुर्भावनापूर्ण (Malicious) मनोभाव:
उस बात के पीछे कोई सकारात्मक उद्देश्य नहीं बल्कि अपमान या उत्तेजना की भावना होनी चाहिए।
● धार्मिक भावनाओं का अपमान:
जौन से भी माध्यम (शब्द, लिपि, संकेत, चित्र, इलेक्ट्रॉनिक संदेश आदि) के द्वारा किसी समूह के धर्म या विश्वासों का लक्ष्य बनाना।
● किसी वर्ग (class) के धार्मिक विश्वासों को ठेस पहुँचाना:
यह प्रावधान किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि समूहेगत स्तर पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर लागू होता है।
⚖️ सजा और दंड (Punishment Under Section 299) :-
धारा 299 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अगर दोषी पाया जाता है तो उसके लिए दंड व्यवस्था इस प्रकार है:
सजा:- 3 वर्ष के लिए कारावास, या जुर्माना, या दोनों
अपराध:- संज्ञेय
जमानत:- अजमानतीय
विचारणीय:- प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
अशमनीय:- अशमनीय का मतलब है, ऐसा अपराध जिसके लिए समझौता नहीं किया जा सकता हैं।
यह सजा गंभीर अपमानजनक कृत्यों को रोकने और सामाजिक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से निर्धारित की गई है।
📊 क्या यह धारा जमानतीय या अजमानतीय है? :-
धारा 299 को लागू करने पर:
यह सामान्यतः संज्ञेय अपराध माना जाता है, यानी पुलिस बिना वारंट किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है।
अजमानतीय होने की संभावना है, इसका अर्थ यह है कि गिरफ्तार व्यक्ति को सीधे जमानत नहीं मिलती और न्यायालय की अनुमति की आवश्यकता हो सकती है।
ये विवरण अलग-अलग स्रोतों में वर्णित हैं और अदालत के निर्णय पर भी निर्भर करते हैं।
📌 धारा 299 को किन उदाहरणों में लागू किया जा सकता है? :-
यहाँ कुछ सामान्य उदाहरण दिए गए हैं जहाँ धारा 299 लागू होने की संभावना बनती है (ये उदाहरण न्यायिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि समझ के लिए):
✔️ सोशल मीडिया पोस्ट:-
किसी धार्मिक प्रतीक या विश्वास पर अपमानजनक टिप्पणी करना जिसे समुदाय द्वारा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला माना जाए।
✔️ सार्वजनिक भाषण:-
सार्वजनिक स्थान पर किसी समूह की धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ उत्तेजक और अपमानजनक टिप्पणी देना।
✔️ चित्र/प्रतिनिधित्व:-
कला या चित्रण जो जानबूझकर किसी धर्म के विश्वासों को अपमानित करता दिखता है।
📍 BNS 299 के अंतर्गत सामयिक मामले (Recent Instances) :-
हाल ही में कुछ मामलों में BNS धारा 299 में FIR दर्ज की गई:
● पिलिबीट में एक किसान के खिलाफ करवा चौथ और महिलाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणी के लिए धारा 299 के तहत मामला दर्ज हुआ।
● देहरादून में एक व्यक्ति पर समुदाय-संवेदनशील पोस्ट डालने के आरोप में धारा 299 सहित अन्य धाराएँ लगाई गईं।
ये उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों में धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले कृत्यों पर कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।
📍 BNS 299 और IPC 295A — तुलना :-
BNS 299 मूल रूप से पहले से मौजूद IPC (Indian Penal Code) की धारा 295A के समान ही है। IPC की धारा 295A भी धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर अपमानित करने वाले कृत्यों को अपराध मानती है।
मुख्य अंतर यह है कि BNS में भाषा और प्रस्तुति आधुनिक कानून के अनुरूप अधिक स्पष्ट रूप से वर्णित है, जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का समावेश।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) :-
Q1: क्या केवल ऑनलाइन पोस्ट ही इस धारा में शामिल हो सकती है?
Ans:- नहीं। यह कानून किसी भी रूप में अभिव्यक्ति पर लागू हो सकता है — चाहे वह सोशल मीडिया हो, सार्वजनिक भाषण हो, फोटो/चित्र हो, या इलेक्ट्रॉनिक संदेश हो।
Q2: क्या किसी भी धार्मिक आलोचना पर धारा लागू हो जाएगी?
Ans:- नहीं। इससे पहले यह सिद्ध होना चाहिए कि कथन जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से कहा गया था ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच सके।
Q3: क्या यह कानून न्यायालय के समक्ष चुनौती योग्य है?
Ans:- हाँ। जैसे IPC 295A के मामले में भी अदालतों ने कई बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सम्मान के बीच संतुलन तलाशा है, वैसे BNS 299 के मामलों में भी न्यायालय की भूमिका निर्णायक होती है।
🧩 निष्कर्ष :-
BNS धारा 299 भारतीय न्याय व्यवस्था में धार्मिक भावनाओं के सम्मान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति का प्रयोग करते समय सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान न पहुँचाए।
किसी भी विवादास्पद टिप्पणी, पोस्ट, भाषण या सार्वजनिक अभिव्यक्ति को साझा करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि कानून किन परिस्थितियों में लागू होता है ताकि सामाजिक शांति और न्याय सुरक्षित रहे।
(IPC) की धारा 295A को (BNS) की धारा 299 में बदल दिया गया है। - अगर आप चाहे तो लोगो पर क्लिक करके देख सकते है |
अस्वीकरण: सलाह सहित यह प्रारूप केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है. यह किसी भी तरह से योग्य अधिवक्ता राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने अधिवक्ता से परामर्श करें. भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है

